Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 18-7-25

गूजरी महला १ ॥
कवन कवन जाचहि प्रभ दाते ता के अंत न परहि सुमार ॥ जैसी भूख होइ अभ अंतरि तूं समरथु सचु देवणहार ॥१॥ ऐ जी जपु तपु संजमु सचु अधार ॥ हरि हरि नामु देहि सुखु पाईऐ तेरी भगति भरे भंडार ॥१॥ रहाउ ॥ सुंन समाधि रहहि लिव लागे एका एकी सबदु बीचार ॥ जलु थलु धरणि गगनु तह नाही आपे आपु कीआ करतार ॥२॥ ना तदि माइआ मगनु न छाइआ ना सूरज चंद न जोति अपार ॥ सरब द्रिसटि लोचन अभ अंतरि एका नदरि सु त्रिभवण सार ॥३॥ पवणु पाणी अगनि तिनि कीआ ब्रहमा बिसनु महेस अकार ॥ सरबे जाचिक तूं प्रभु दाता दाति करे अपुनै बीचार ॥४॥ कोटि तेतीस जाचहि प्रभ नाइक देदे तोटि नाही भंडार ॥ ऊंधै भांडै कछु न समावै सीधै अम्रितु परै निहार ॥५॥ सिध समाधी अंतरि जाचहि रिधि सिधि जाचि करहि जैकार ॥ जैसी पिआस होइ मन अंतरि तैसो जलु देवहि परकार ॥६॥ बडे भाग गुरु सेवहि अपुना भेदु नाही गुरदेव मुरार ॥ ता कउ कालु नाही जमु जोहै बूझहि अंतरि सबदु बीचार ॥७॥ अब तब अवरु न मागउ हरि पहि नामु निरंजन दीजै पिआरि ॥ नानक चात्रिकु अम्रित जलु मागै हरि जसु दीजै किरपा धारि ॥८॥२॥ {पन्ना 503-504}

अर्थ: हे प्रभू जी! (हम जीवों को) अपना नाम दे (तेरे नाम की बरकति से ही) आत्मिक आनंद मिलता है (इस पदार्थ की तेरे घर में कोई कमी नहीं है) तेरी भक्ति के (तेरे पास) खजाने भरे पड़े हैं। तेरा नाम ही (हमारे लिए) जप है तप है संजम है, तेरा नाम ही (हमारे वास्ते) सदा स्थिर रहने वाला आसरा है।1। रहाउ।

हे दातार प्रभू! बेअंत जीव (तेरे दर से दातें) मांगते हैं उनकी गिनती के अंत नहीं पड़ सकते। जैसी (किसी के) धुर अंदर (मांगने की) भूख होती है, हे देवनहार प्रभू! तू (पूरी करता है), तू सदा स्थिर है और दातें देने योग्य है।1।

हे करतार! जब तूने अपने आप को खुद ही प्रगट किया था, तब ना पानी था, ना सूखा था, ना धरती थी, ना आकाश था, तब तू खुद ही अफूर अवस्था में (अपने अंदर) सुरति जोड़ के समाधि लगाए बैठा था, तू अकेला खुद ही अपने इरादे को समझता था।2।

तब ना ये माया थी, ना इस माया के प्रभाव में मस्त कोई जीव था, ना तब सुरज था, ना चंद्रमा था, ना ही कोई और ज्योति थी। हे प्रभू! सारे जीवों को देख सकने वाली तेरी आँख, तीनों भवनों की सार ले सकने वाली तेरी अपनी ही नजर तेरे अपने ही अंदर टिकी हुई थी।3।

जब उस परमात्मा ने हवा-पानी-आग (आदि तत्व) रचे, तो ब्रहमा-विष्णु-शिव आदि के वजूद रचे। हे प्रभू! हे प्रभू! (ये ब्रहमा-विष्णु-शिव आदि) सारे ही (तेरे पैदा किए हुए जीव तेरे दर के) मंगते हैं तू सबको दातें देने वाला है। (समर्थ प्रभू) अपनी विचार अनुसार (सबको) दातें देता है।4।

हे सबकी अगुवाई करने वाले नायक प्रभू! तैंतीस करोड़ देवते (भी तेरे दर के) मंगते हैं। (उनको दातें) दे दे के तेरे खजानों में घाटा नहीं पड़ता। (मायावी पदार्थ तो सबको मिलते हैं, पर) श्रद्धाहीन हृदय में (तेरे नाम-अमृत की दाति में से) कुछ भी नहीं टिकता, और श्रद्धा-भरपूर हृदय में तेरी मेहर की निगाह से आत्मिक जीवन देने वाला तेरा नाम टिकता है।5।

योग-साधना में पहुँचे हुए जोगी भी समाधि में टिक के तुझसे ही माँगते हैं, करामाती ताकतें मांग-मांग के तेरी जै-जैकार करते हैं। (यही कहते हैं–तेरी जय हो, तेरी जय हो) जैसी किसी के मन में (मांगने की) प्यास होती है, तू, हे प्रभू! उसी किस्म का जल दे देता है।6।

पर असली बड़े भाग्य उन लोगों के हैं जो अपने गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं। गुरू और परमातमा में कोई फर्क नहीं होता। जो लोग अपने विचार-मण्डल में (मायावी पदार्थों की मांग की जगह) गुरू के शबद को समझते हैं, आत्मिक मौत उनके नजदीक भी नहीं फटक सकती।7।

(इस वास्ते) मैं कभी भी परमात्मा से और कुछ नहीं मांगता। (मैं यही अरदास करता हूँ-) हे निरंजन प्रभू! प्यार की निगाह से मुझे अपना नाम बख्श। नानक पपीहा आत्मिक-जीवन देने वाला नाम-जल मांगता है। हे हरी! कृपा करके अपनी सिफत-सालाह दे।8।2।

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