Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 7-7-25

रागु सोरठि बाणी भगत कबीर जी की घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥ किआ बेद पुरानां सुनीऐ ॥ पड़े सुने किआ होई ॥ जउ सहज न मिलिओ सोई ॥१॥ हरि का नामु न जपसि गवारा ॥ किआ सोचहि बारं बारा ॥१॥ रहाउ ॥ अंधिआरे दीपकु चहीऐ ॥ इक बसतु अगोचर लहीऐ ॥ बसतु अगोचर पाई ॥ घटि दीपकु रहिआ समाई ॥२॥ कहि कबीर अब जानिआ ॥ जब जानिआ तउ मनु मानिआ ॥ मन माने लोगु न पतीजै ॥ न पतीजै तउ किआ कीजै ॥३॥७॥ {पन्ना 655-656}

अर्थ: हे मूर्ख! तू परमात्मा का नाम (तो) सिमरता नहीं (नाम को विसार के) बार बार और सोचें सोचने का तुझे क्या फायदा होगा?।1। रहाउ।

(हे गवार!) वेद-पुराण पुस्तकें निरी पढ़ने-सुनने का कोई फायदा नहीं, अगर इस पढ़ने-सुनने के कुदरती नतीजे के तौर पर उस प्रभू का मिलाप ना हो।1।

अंधेरे में (तो) दीए की जरूरत होती है (ता कि अंदर से) वह हरी-नाम पदार्थ मिल जाए, जिस तक इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती, (इस तरह धार्मिक पुस्तकें पढ़ने से उस ज्ञान का दीपक मन में जलना चाहिए जिससे अंदर बसता ईश्वर मिल जाए)। जिस मनुष्य को वह अपहुँच हरी-नाम पदार्थ मिल जाता है, उस के अंदर वह दीया फिर सदा टिका रहता है।2।

कबीर कहता है– उस अपहुँच हरी-नाम पदार्थ से मेरी भी जान-पहचान हो गई है। जब से ये जान-पहचान हुई है, मेरा मन उसी में ही परच गया है। (पर जगत चाहता है धर्म-पुस्तकों के रिवायती पाठ करने करवाने और तीर्थ आदि के स्नान; सो) परमात्मा में मन जोड़ने से (कर्म-काण्डी) जगत की तसल्ली नहीं होती; (दूसरी तरफ) नाम सिमरन वाले को भी ये मुथाजी नहीं होती कि जरूर ही लोगों की तसल्ली भी कराए, (तभी तो, आम तौर पर इनका मेल नहीं हो पाता)।3।7।

शबद का भाव: अगर मनुष्य की लगन प्रभू के नाम में नहीं बनती तो धर्म-पुस्तकों के पाठ कराने का भी कोई लाभ नहीं होता। ये पाठ करवाने सिर्फ लोकाचारी ही रह जाते हैं।7।

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