Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 25-6-26

सोरठि महला ५ ॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥ गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥१॥ मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥ जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥१॥ रहाउ ॥ वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥ तिन की धूरि नानकु दासु बाछै जिन हरि नामु रिदै परोई ॥२॥५॥३३॥ {पन्ना 617}

अर्थ: हे मेरे मन! उस प्रभू को जपा करो जो सबसे बड़ा है, जो सृष्टि को पालने वाला है, और, जिसका आसरा लेने से सुख प्राप्त कर लिया जाता है, फिर कभी दुख नहीं व्याप्ता।1। रहाउ।

हे भाई! उस परमात्मा का सिमरन करने से (मन से विकारों की) सारी मैल उतर जाती है जो नाश-रहित है, और, जो सारे जीवों को दातें देने वाला है। वह प्रभू सारे गुणों का खजाना है, भक्तों के वास्ते हर वक्त का सहारा है। पर, कोई विरला मनुष्य ही उसका मिलाप हासिल करता है।1।

हे भाई! बड़ी किस्मत से भले मनुष्यों की संगति हासिल होती है, उनको मिलने से खोटी बुद्धि नाश हो जाती है। दास नानक (भी) उनके चरणों की धूड़ माँगता है, जिन्होंने परमात्मा का नाम अपने हृदय में परो रखा है।2।5।33।

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