Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 18-9-25

बिलावलु महला १ ॥
आपे सबदु आपे नीसानु ॥ आपे सुरता आपे जानु ॥ आपे करि करि वेखै ताणु ॥ तू दाता नामु परवाणु ॥१॥ ऐसा नामु निरंजन देउ ॥ हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥१॥ रहाउ ॥ माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥ राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥ नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥२॥ चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥ बापु दिसै वेजाति न होइ ॥ एके कउ नाही भउ कोइ ॥ करता करे करावै सोइ ॥३॥ सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥ ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥ अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥ नानक नामि रते निसतारिआ ॥४॥३॥ {पन्ना 795-796}

अर्थ: हे माया के प्रभाव-रहित प्रकाश-रूप प्रभू! तेरा नाम भी एैसा ही है (जैसा तू खुद है। भाव, तेरा नाम भी माया के मोह से बचाता है)। हे प्रभू! तेरा कोई खास चिन्ह-चक्र नहीं मिल सकता, तेरा भेद नहीं पाया जा सकता। मैं (तेरे दर पर) मंगता हूँ (और तुझसे तेरे नाम की दाति माँगता हूँ)।1। रहाउ।

(जिस मनुष्य को नाम की दाति मिल जाती है उसे यह यकीन बन जाता है कि प्रभू) स्वयं ही सिफत-सालाह है (भाव, जहाँ उसकी सिफत-सालाह होती है वहाँ वह मौजूद है), स्वयं ही (जीव के लिए जीवन-यात्रा में) राहदारी है, प्रभू खुद ही (जीवों की अरदासें) सुनने वाला है, खुद ही (जीवों के दुख-दर्द) जानने वाला है। प्रभू स्वयं ही जगत-रचना रच के खुद ही अपना (यह) बल देख रहा है।

हे प्रभू! तू (जीवों को सबि दातें) देने वाला है, (जिसको तू अपना नाम बख्शता है, वह तेरे दर पर) कबूल हो जाता है।1।

(नाम जपने वाले को ये समझ आ जाती है कि) माया का मोह एक व्यभिचारिन स्त्री के तुल्य है, माया एक टूणे करने वाली बुरी स्त्री के समान है, दुनियाँ की हकूमतें और सुंदरता नाशवंत हैं, थोड़े ही दिन रहने वाले हैं (पर इनके असर तले मनुष्य जहालत के अंधकार में जीवन में ठोकरें खाता फिरता है)। जिस मनुष्य को प्रभू का नाम मिल जाता है, उसको (माया के मोह के) अंधेरे में रोशनी मिल जाती है।2।

(ये बात अच्छी तरह) परख के देख ली है, जिसमें कोई शक नहीं कि जिसका पिता प्रत्यक्ष दिखता हो वह बुरे असल वाला नहीं कहलवाता (कि वह पिता के अलावा किसी और की औलाद है) (जो मनुष्य अपने सिर पर पिता-प्रभू को रखवाला मानता है वह विकारों की ओर नहीं पलटता)। एक प्रभू-पिता वाले को (किसी और से) कोई डर नहीं रहता (क्योंकि उसको यकीन बना रहता है कि) वह परमात्मा ही सब कुछ करता है और (जीवों से) करवाता है।3।

जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के स्वैभाव को खत्म कर देते हैं अपने मन को मायावी फुरनों से रोक लेते हैं, वे विकारों की ओर से रुके रहते हैं क्योंकि सच्चा करतार उनके मन को (अपने नाम का) आसरा देता है। मैं गुरू से सदके हूँ, उसके बिना कोई और ऐसा नहीं (जो मन को प्रभू में जोड़ने में सहायक हो)।

हे नानक! प्रभू-नाम में रंगे हुए लोगों को प्रभू (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है।4।3।

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