बिलावलु महला ५ ॥
जीवउ नामु सुनी ॥ जउ सुप्रसंन भए गुर पूरे तब मेरी आस पुनी ॥१॥ रहाउ ॥ पीर गई बाधी मनि धीरा मोहिओ अनद धुनी ॥ उपजिओ चाउ मिलन प्रभ प्रीतम रहनु न जाइ खिनी ॥१॥ अनिक भगत अनिक जन तारे सिमरहि अनिक मुनी ॥ अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥२॥२॥१२७॥ {पन्ना 829}
अर्थ: (हे भाई! परमात्मा का) नाम सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है (पर प्रभू का नाम सिमरने की) मेरी आशा तब पूरी होती है जब पूरा गुरू (मेरे ऊपर) बहुत प्रसन्न होता है।1। रहाउ।
(हे भाई! गुरू की कृपा से जब मैं नाम जपता हूँ, मेरे अंदर से) पीड़ा दूर हो जाती है, मेरे में हौंसला बन जाता है, मैं (अपने अंदर पैदा हुए) आत्मिक आनंद की रौंअ से मस्त हो जाता हूँ, मेरे अंदर प्रीतम प्रभू को मिलने का चाव पैदा हो जाता है, (वह चाव इतना तीव्र हो जाता है कि प्रभू के मिलाप के बिना) एक छिन भी रहा नहीं जा सकता।1।
हे मालिक! (कह-) हे अनेकों गुणों के मालिक प्रभू! (तेरा नाम) अंधे मनुष्य को, जैसे, छड़ी मिल जाती है, कंगाल को धन मिल जाता है। हे प्रभू! अनेकों ही ऋषि-मुनि तेरा नाम सिमरते हैं। (सिमरन करने वाले) अनेकों ही भक्त अनेकों ही सेवक, हे प्रभू! तूने (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिए हैं।2।2।127।
अर्थ: (हे भाई! परमात्मा का) नाम सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है (पर प्रभू का नाम सिमरने की) मेरी आशा तब पूरी होती है जब पूरा गुरू (मेरे ऊपर) बहुत प्रसन्न होता है।1। रहाउ।
(हे भाई! गुरू की कृपा से जब मैं नाम जपता हूँ, मेरे अंदर से) पीड़ा दूर हो जाती है, मेरे में हौंसला बन जाता है, मैं (अपने अंदर पैदा हुए) आत्मिक आनंद की रौंअ से मस्त हो जाता हूँ, मेरे अंदर प्रीतम प्रभू को मिलने का चाव पैदा हो जाता है, (वह चाव इतना तीव्र हो जाता है कि प्रभू के मिलाप के बिना) एक छिन भी रहा नहीं जा सकता।1।
हे मालिक! (कह-) हे अनेकों गुणों के मालिक प्रभू! (तेरा नाम) अंधे मनुष्य को, जैसे, छड़ी मिल जाती है, कंगाल को धन मिल जाता है। हे प्रभू! अनेकों ही ऋषि-मुनि तेरा नाम सिमरते हैं। (सिमरन करने वाले) अनेकों ही भक्त अनेकों ही सेवक, हे प्रभू! तूने (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिए हैं।2।2।127।



