देवगंधारी महला ५ ॥
माई प्रभ के चरन निहारउ ॥ करहु अनुग्रहु सुआमी मेरे मन ते कबहु न डारउ ॥१॥ रहाउ ॥ साधू धूरि लाई मुखि मसतकि काम क्रोध बिखु जारउ ॥ सभ ते नीचु आतम करि मानउ मन महि इहु सुखु धारउ ॥१॥ गुन गावह ठाकुर अबिनासी कलमल सगले झारउ ॥ नाम निधानु नानक दानु पावउ कंठि लाइ उरि धारउ ॥२॥१९॥ {पन्ना 532}
अर्थ: हे (मेरी) माँ! मैं (सदा) परमात्मा के (सुंदर) चरणों की ओर देखता रहता हूँ (और, अरदास करता रहता हूँ कि) हे मेरे मालिक! (मेरे पर) मेहर कर, मैं (अपने) मन से (तुझे) कभी भी ना विसारूँ।1। रहाउ।
(हे माँ! मैं प्रभू के आगे अरदास करता रहता हूँ कि) मैं गुरू के पैरों की खाक अपने मुँह पर अपने माथे पर लगाता रहूँ, (और, अपने अंदर से आत्मिक जीवन को मार देने वाली) काम-क्रोध का जहर जलाता रहूँ। मैं अपने आप को सबसे नीचा समझता रहूँ, और अपने मन में (गरीबी स्वभाव वाला) ये सुख (सदा) टिकाए रखूँ।1।
हे भाई! आओ, मिल के ठाकुर-प्रभू के गुण गाएं, (गुण गाने की बरकति से) मैं अपने सारे (पिछले) पाप (मन से) झाड़ रहा हूँ। हे नानक! (कह– हे प्रभू! मैं तेरे पास से ये) दान (माँगता हूँ कि) मैं तेरा नाम खजाना हासिल कर लूँ, और इसको अपने गले से लगा के अपने हृदय में टिकाए रखूँ।2।19।



