सलोक मः १ ॥
दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥ जेते जीअ तेते वणजारे ॥ खुल्हे हट होआ वापारु ॥ जो पहुचै सो चलणहारु ॥ धरमु दलालु पाए नीसाणु ॥ नानक नामु लाहा परवाणु ॥ घरि आए वजी वाधाई ॥ सच नाम की मिली वडिआई ॥१॥ मः १ ॥ राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥ दिहु बगा तपै घणा कालिआ काले वंन ॥ अंधे अकली बाहरे मूरख अंध गिआनु ॥ नानक नदरी बाहरे कबहि न पावहि मानु ॥२॥ पउड़ी ॥ काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥ इकि दूजै भाइ खुआइअनु हउमै विचि विआपे ॥ इहु मानस जनमु दुल्मभु सा मनमुख संतापे ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी जिसु सतिगुरु थापे ॥ सभु जगु खेलु रचाइओनु सभ वरतै आपे ॥१३॥ {पन्ना 789}
अर्थ: जगत-रूपी शहर में चाँद और सूरज, जैसे दो दीप जग रहे हैं, और चौदह लोक (इस जगत-शहर के, जैसे) बाजार हैं, सारे जीव (इस शहर के) व्यापारी हैं। जब दुकान खुल गई (जगत-रचना हुई), व्यापार होने लगा। जो जो व्यापारी यहाँ आता है वह मुसाफिर ही होता है।
(हरेक जीव-व्यापारी के करणी-रूपी सौदे पर) धर्म-रूपी दलाल निशान लगाए जाता है (कि इसका सौदा खरा है अथवा खोटा), हे नानक! (शाह-प्रभू की हाट पर) ‘नाम’ नफा ही कबूल होता है। जो (ये नफा कमा के) हजूरी में पहुँचता है उसको लाली चढ़ती है और सच्चे नाम की (प्राप्ति का) उसको महातम (वडिआई) मिलता है।1।
अर्थ: रातें काली होती हैं (पर) सफेद चीजों के वही सफेद रंग ही रहते हैं (रात की कालिख का असर उन पर नहीं पड़ता), दिन सफेद होता है, अच्छा खासा चमकता है, पर काले पदार्थों के रंग काले ही रहते हैं (दिन की रौशनी का असर इन काली चीजों पर नहीं पड़ता)। (इसी तरह) जो मनुष्य अंधे मूर्ख बुद्धि-हीन हैं उनकी अंधी ही मति रहती है। हे नानक! जिन पर प्रभू की मेहर की नजर नहीं हुई उनको कभी (‘नाम’ की प्राप्ति का) सम्मान नहीं मिलता।2।
अर्थ: ये मानस-देही (मानो) किला है जो सच्चे प्रभू ने खुद बनाया है, (पर इस किले में रहते हुए भी) कई जीवों को माया के मोह में डाल के उसने स्वयं कुमार्ग पर डाल दिए हैं, वे (बिचारे) अहंकार में फंसे पड़े हैं।
ये मानस-शरीर बड़ी मुश्किल से मिला था, पर मन के पीछे चल के जीव दुखी हो रहे हैं, (ये शरीर प्राप्त करके क्या करना था) ये समझ उसी को आती है जिसको प्रभू स्वयं समझ बख्शे और सतिगुरू हौसला (पीठ थप-थपाए) दे।
(पर इस अधोगति के लिए किसी को निंदा भी नहीं जा सकता क्योंकि) ये सारा जगत-खेल तो उस प्रभू ने ही बनाया है और इसमें हर जगह स्वयं ही मौजूद है।13।



