सलोकु मः ५ ॥
हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥ जिनि कीती तिसै न जाणई नानक फिटु अलूणी देह ॥१॥ मः ५ ॥ घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥ नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥२॥ पउड़ी ॥ आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥ आपे संजमि वरतै स्वामी आपि जपाइहि नामु ॥ आपि दइआलु होइ भउ खंडनु आपि करै सभु दानु ॥ जिस नो गुरमुखि आपि बुझाए सो सद ही दरगहि पाए मानु ॥ जिस दी पैज रखै हरि सुआमी सो सचा हरि जानु ॥१४॥ {पन्ना 553}
अर्थ: जो मनुष्य साध-संगति में हरी का नाम नहीं सिमरते, उनके शरीर पर राख पड़ती है (भाव, उनके शरीर धिक्कारे जाते हैं)। हे नानक! प्रेम से विहीन उस शरीर को धिक्कार है, जो उस प्रभू को नहीं पहचानता जिसने उसको बनाया है।1।
हे नानक! (जिस मनुष्य के) हृदय में प्रभू के चरण-कमल बसते हैं और जिहवा हरी को जपती है, और प्रभू (जिस शरीर के होने से) सिमरा जाता है उस शरीर की पालना करो।2।
प्रभू स्वयं ही अढ़सठ तीर्थों को करने वाला है, खुद ही (उन तीर्थों पर) स्नान करता है, मालिक स्वयं ही जुगति में बरतता है और खुद ही नाम जपाता है, भय दूर करने वाला प्रभू खुद ही दयालु होता है और खुद ही सब तरह के दान करता है, जिस मनुष्य को सतिगुरू के माध्यम से समझ बख्शता है, वह सदा ही दरगाह में आदर पाता है। जिसकी लाज खुद रखता है वह ईश्वर का प्यारा सेवक ईश्वर का ही रूप है।14।



