Rojana Hukam (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 2-6-25

वडहंसु महला ३ ॥
रतन पदारथ वणजीअहि सतिगुरि दीआ बुझाई राम ॥ लाहा लाभु हरि भगति है गुण महि गुणी समाई राम ॥ गुण महि गुणी समाए जिसु आपि बुझाए लाहा भगति सैसारे ॥ बिनु भगती सुखु न होई दूजै पति खोई गुरमति नामु अधारे ॥ वखरु नामु सदा लाभु है जिस नो एतु वापारि लाए ॥ रतन पदारथ वणजीअहि जां सतिगुरु देइ बुझाए ॥१॥ माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा राम ॥ कूड़ु बोलि बिखु खावणी बहु वधहि विकारा राम ॥ बहु वधहि विकारा सहसा इहु संसारा बिनु नावै पति खोई ॥ पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणहि बिनु बूझे सुखु न होई ॥ आवण जाणा कदे न चूकै माइआ मोह पिआरा ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा ॥२॥ खोटे खरे सभि परखीअनि तितु सचे कै दरबारा राम ॥ खोटे दरगह सुटीअनि ऊभे करनि पुकारा राम ॥ ऊभे करनि पुकारा मुगध गवारा मनमुखि जनमु गवाइआ ॥ बिखिआ माइआ जिनि जगतु भुलाइआ साचा नामु न भाइआ ॥ मनमुख संता नालि वैरु करि दुखु खटे संसारा ॥ खोटे खरे परखीअनि तितु सचै दरवारा राम ॥३॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई राम ॥ जितु भावै तितु लाइसी जिउ तिस दी वडिआई राम ॥ जिउ तिस दी वडिआई आपि कराई वरीआमु न फुसी कोई ॥ जगजीवनु दाता करमि बिधाता आपे बखसे सोई ॥ गुर परसादी आपु गवाईऐ नानक नामि पति पाई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई ॥४॥४॥ {पन्ना 569-570}

अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को गुरू ने (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श दी (उसके हृदय-नगर में सदा परमात्मा की सिफत सालाह के) कीमती रत्नों का व्यापार होता रहता है, उसको परमात्मा की भक्ति की कमाई प्राप्त होती रहती है, परमात्मा की सिफत सालाह में जुड़ के उसकी लीनता गुणों के मालिक प्रभू में हो जाती है।

हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (आत्मिक जीवन की) समझ देता है वह मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह में टिक के गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है, वह जगत में (जन्म ले के) प्रभू की भक्ति का लाभ कमाता है। गुरू की मति पर चल के वह हरी-नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बनाए रखता है (उसे निश्चय रहता है कि) भक्ति के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता, माया के मोह में फसने वाले ने (लोक-परलोक में अपनी) इज्जत गवा ली।

हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा इस (नाम-) व्यापार में लगा देता है वह सदा नाम का व्यापार करता है, नाम का ही लाभ कमाता है। भाई! जब गुरू (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है तो (मनुष्य के हृदय-शहर में) प्रभू की सिफत सालाह के कीमती रत्नों का व्यापार होने लगता है।1।

हे भाई! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है (निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है, (इस तरह) झूठ बोल बोल के (आत्मिक मौत लाने वाले मोह का) जहर खाया जाता है, (जिसके कारण मनुष्य के अंदर) अनेकों विकार बढ़ते जाते हैं। अनेकों विकार बढ़ते जाते हैं, ये जगत भी (निरा) सहम (का घर ही प्रतीत होता) है, परमात्मा के नाम से टूट के मनुष्य (लोक-परलोक में) इज्जत गवा लेता है।

जिस मनुष्य को सदा माया का मोह प्यारा लगता है उसके जनम-मरण का चक्र कभी समाप्त नहीं होता। हे भाई! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है, (निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है।2।

हे भाई! बुरे और अच्छे सारे (जीव) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के दरबार में परखे जाते हैं। बुरे लोग तो दरबार में रद्द कर दिए जाते हैं, वे वहां खड़े हो के पुकार करते हैं। जिन मनुष्यों ने अपने मन के पीछे चल के अपना मानस जन्म गवा लिया, वह मूर्ख गवार (प्रभू की दरगाह में परे फेंके जाने पर) खड़े पुकार करते हैं (तरले मिन्नतें करते हैं)। (आत्मिक जीवन को खत्म करने वाली) जिस जहर-माया ने जगत को गलत रास्ते पर डाल रखा है (उस में फंस के उनको) सदा कायम रहने वाला हरी-नाम अच्छा नहीं था लगा। (संत-जन ऐसे मनुष्यों को उपदेश तो करते हैं, पर) अपने मन के पीछे चलने वाला जगत सेंत-जनों के साथ वैर करके दुख सहेड़ता रहता है।

हे भाई! बुरे और अच्छे (सारे जीव) उस सदा कायम रहने वाले के दरबार में परखे जाते हैं।3।

(हे भाई! जीवों को ‘खोटे-खरे’ परमात्मा) खुद ही बनाता है। (किसी जीव के खोटे अथवा खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता। (प्रभू की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता। जिस काम में (जीवों को लगाने की प्रभू की) मर्जी होती है उस काम में लगा देता है, जैसे उसकी रजा होती है (वैसे करवाता है)। जैसे उस प्रभू की रजा होती है वैसे ही (जीवों से काम) करवाता है (अपने आप में) ना कोई जीव शूरवीर है ना ही कोई कमजोर है। जगत का सहारा दातार जो जीवों के किए कर्मों के अनुसार जीवों को पैदा करने वाला है वह स्वयं ही कृपा करता है (और जीवों को सही जीवन राह बताता है)।

हे नानक! (कह– हे भाई!) गुरू की कृपा से ही स्वै भाव दूर किया जा सकता है (जिसने स्वै भाव दूर कर लिया, उसने) परमात्मा के नाम में जुड़ के (लोक-परलोक में) सम्मान पा लिया है। (हे भाई! जीवों को खोटे-खरे परमात्मा) खुद ही बनाता है (किसी जीव के खोटे या खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता। (प्रभू की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता।4।4।

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