सूही ॥
जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥ करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥ संगु चलत है हम भी चलना ॥ दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥१॥ किआ तू सोइआ जागु इआना ॥ तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥१॥ रहाउ ॥ जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अ्मबरावै ॥ सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥ करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥ हिरदै नामु सम्हारि सवेरा ॥२॥ जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥ सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥ कहि रविदास निदानि दिवाने ॥ चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥३॥२॥ {पन्ना 793-794}
अर्थ: (मनुष्य की जिंदगी में) जो जो दिन आते हैं, वह दिन (असल में साथ-साथ) गुजरते जाते हैं (भाव, उम्र में से कम होते जाते हैं), (यहाँ से हरेक ने) कूच कर जाना है (किसी की भी यहाँ) सदा ही रिहायश नहीं है। हमारा साथ चलता जा रहा है, हमने भी (यहाँ से) चले जाना है; ये दूर की यात्रा है और मौत सिर पर खड़ी है (पता नहीं कौन से वक्त आ जाए)।1।
हे अंजान! होश कर! तू क्यों सो रहा है? तू जगत में इस जीवन को सदा कायम रहने वाला समझ बैठा है।1। रहाउ।
(तू हर वक्त रिजक की ही फिक्र में रहता है, देख) जिस प्रभू ने जिंद दी है, वह रिजक भी पहुँचाता है, सारे शरीरों में बैठा हुआ वह स्वयं रिजक के आहर पैदा कर रहा है। मैं (इतना बड़ा हॅूँ) मेरी (इतनी मल्कियत है) – छोड़ ये बातें, प्रभू की बंदगी कर, अब वक्त रहते उसका नाम अपने दिल में संभाल।2।
उम्र बीतने पर आ रही है, पर तूने अपना राह सही नहीं बनाया; शाम पड़ रही है, हर तरफ अंधकार ही अंधकार छाने वाला है। रविदास कहता है– हे कमले मनुष्य! तू प्रभू को याद नहीं करता, दुनिया (जिससे तू मन जोड़े बैठा है) अंत में नाश हो जाने वाली है।3।2।
नोट: आम तौर पर शब्द ‘निदानि’ को फारसी के शब्द ‘नादान’ समझ के इसके अर्थ ‘मूर्ख’ किए जा रहे हैं। इसके साथ लगा हुआ शब्द ‘दिवाने’ भी कुछ इसी ही अर्थ में मन का झुकाव पैदा करता है॥ पर यह गलत है, क्योंकि गुरू ग्रंथ साहिब जी में जहाँ कहीं भी ये शब्द आया हैइसके अर्थ ‘अंत को, आखिर को’ किया जाता है। ये संस्कृत का शब्द ‘निदान’ है जिसका अर्थ है ‘आखीर, अंत (end, termination)। देखें;
‘बिनु नारवै पाजु लहगु निदानि ॥’ (बिलावल महला ३)
‘नानक ऐव न जापई कोई खाइ निदानि॥’ (सलोक म: १, बिलावल की वार)
‘कहि कबीर ते अंति बिगूते आइआ कालु निदाना॥’ (बिलावलु)
बाकी रहा ये एतराज कि ये अर्थ करने के वक्त ‘निदानि’ को उठा के आखिर में शब्द ‘फ़नखाने’ के साथ मिलाना पड़ता है, इस ‘अनवय’ में खींच प्रतीत होती है। इसका उक्तर ये है कि हरेक कवि की कविता का अपना-अपना ढंग है; भगत रविदास जी भी एक और जगह यही तरीका इस्तेमाल करते हैं;
‘निंदकु सोधि सोधि बीचारिआ ॥ कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ॥’ (गौंड)
इस प्रमाण में शब्द ‘निंदकु’ तुक का अर्थ करने के वक्त आखिर में शब्द ‘पापी’ के साथ बर्तना पड़ता है।
शबद का भाव: जगत में सदा बैठे नहीं रहना। इसके मोह में मस्त हो के प्रभू की भक्ति के प्रति गाफिल ना होएं।



