Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 25-7-26

सलोकु मः ३ ॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥ हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥ हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१॥ मः ३ ॥ आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥ सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥ नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥२॥ पउड़ी ॥ तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥ तुधु आपे सिसटि सिरजीआ आपे फुनि गोई ॥ सभु इको सबदु वरतदा जो करे सु होई ॥ वडिआई गुरमुखि देइ प्रभु हरि पावै सोई ॥ गुरमुखि नानक आराधिआ सभि आखहु धंनु धंनु धंनु गुरु सोई ॥२९॥१॥ सुधु{पन्ना 653}

अर्थ: हे मन! प्यार से एकाग्रचिक्त हो के हरी का सिमरन कर; हरी में ये हमेशा के लिए गुण हैं कि दातें दे के पछताता नहीं।

मैं हरी से सदा कुर्बान हूँ, जिसकी सेवा करने से सुख मिलता है; हे नानक! गुरमुख जन अहंकार को सतिगुरू के शबद के द्वारा जला के हरी में मिले रहते हैं।1।

हरी ने खुद ही मनुष्यों को सेवा में लगाया है, खुद ही बख्शिश करता है, खुद ही सबका माँ-बाप है और खुद ही सबकी संभाल करता है।

हे नानक! जो मनुष्य नाम जपते हैं, वे अपने ठिकाने पर टिके हुए हैं, हरेक युग में उनकी शोभा होती है।2।

हे करतार! तू सारी कुदरत का रचयता है; तेरे बिना तेरे जितना कोई और मुझे नहीं दिखता; तू खुद ही सृष्टि को पैदा करता है और खुद ही फिर नाश करता है।

हर जगह (हरी का) ही हुकम बरत रहा है; जो वह करता है वही होता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसे प्रभू महिमा बख्शता है, वह उस हरी को मिल लेता है।

हे नानक! गुरू के सन्मुख (होने वाले) मनुष्य हरी को सिमरते हैं, (हे भाई!) सभी कहो, कि वह सतिगुरू धन्य है, धन्य है, धन्य है।29।1। सुधु।

You may also like these