Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 20-3-26

सलोकु ॥
किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥ नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥१॥ छंतु ॥ तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥ भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥ जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥ कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥१॥
सलोकु ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥ नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥१॥ छंतु ॥ जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥ से साची दरगह भाणे राम ॥ ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥ हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥ सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥ कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥२॥
सलोकु ॥
देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥ नानक सफल जनमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥१॥ छंतु ॥ तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥ जन चाखि अघाणे हरि हरि अम्रितु मीठा राम ॥ हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥ दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥ मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥ कहु नानक तिन खंनीऐ वंञा जिन घटि मेरा हरि प्रभु वूठा ॥३॥
सलोकु ॥
जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥ नानक जाणे सति सांई संत न बाहरा ॥१॥ छंतु ॥ मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥ संगि जोती जोति मिलाना राम ॥ समाइ पूरन पुरख करते आपि आपहि जाणीऐ ॥ तह सुंनि सहजि समाधि लागी एकु एकु वखाणीऐ ॥ आपि गुपता आपि मुकता आपि आपु वखाना ॥ नानक भ्रम भै गुण बिनासे मिलि जलु जलहि खटाना ॥४॥२॥ {पन्ना 578}

अर्थ: हे भाई! नाशवंत पदार्थों की बात क्या सुनता है? (ये पदार्थ तो) हवा के बुल-बुलों की तरह उड़ जाते हैं। हे नानक (सिर्फ) वह कान (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हैं जो सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू (की सिफत सालाह) को सुनते हैं।1।

छंत। हे भाई! जिन मनुष्यों ने अपने कानों से प्रभू (का नाम) सुना है, उनसे मैं सदके कुर्बान जाता हूँ। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपते हैं वे आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी रहते हैं। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में रह के सुखी जीवन जीते हैं, वे अमूल्य गुणवान हो जाते हैं, वे तो जगत को संसार-समुंद्र से पार लंघाने के लिए आते हैं। हे भाई! इस भयानक संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते परमात्मा के चरण जहाज हैं (खुद नाम जपने वाले मनुष्य) अनेकों को (प्रभू-चरनों में जोड़ के) पार लंघा देते हैं। मेरे मालिक प्रभू ने जिन पर मेहर (की निगाह) की, उनके कर्मों के हिसाब करने उसने छोड़ दिए। हे नानक! कह– मैं उस मनुष्य से सदके कुर्बान जाता हूँ जिसने अपने कानों से परमात्मा (की सिफत सालाह) को सुना है।1।

अर्थ: मैंने अपनी आँखों से जगत को देखा है, (अभी भी) मुझे (जगत को देखने की प्यास) बहुत है, ये प्यास बुझती नहीं। हे नानक! जिन आँखों ने मेरे प्यारे प्रभू को देखा, वे आँखें और किस्म की हैं (उन आँखों को दुनियावी पदार्थ देखने की लालसा नहीं होती)।1।

छंतु। मैं उनसे सदके हूँ, जिन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हैं, वे (भाग्यशाली) लोग सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में शोभा देते हैं। जिन जीवों को मालिक प्रभू ने आदर-मान दिया है, (हर जगह) जाने माने जाते हैं, वे परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं, परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के नाम-रस से (दुनियावी पदार्थों की तरफ से) तृप्त रहते हैं वे आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं, वे मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचानते हैं।

हे भाई! वही मनुष्य भले हैं, संत हैं, सुखी हैं, जो अपने मालिक प्रभू को पसंद हैं। हे नानक! कह– जिन मनुष्यों ने हरी प्रभू के दर्शन कर लिए हैं, मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ।2।

अर्थ: हे भाई! जो शरीर परमात्मा के नाम से वंचित रहता है, वह माया के मोह के अंधेरे में अंधा हुआ रहता है। हे नानक! उस मनुष्य का जीवन कामयाब है जिसके दिल में सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभू आ बसता है।1।

छंतु। मैं उन मनुष्यों पर से सदा सदके कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने मेरे हरी-प्रभू के दर्शन कर लिए हैं। वे मनुष्य (परमात्मा का नाम-रस) चख के (दुनियावी पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाते हैं, उनको आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-जल मीठा लगता है। परमात्मा उनके मन को भाता है, परमात्मा उन पर प्रसन्न हो जाता है, उनके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है, उनको सारे आनंद प्राप्त हो जाते हैं। जगत के मालिक प्रभू की जै-जैकार कह कह के उनके शरीर से दुख व भ्रम दूर हो जाते हैं। वे मनुष्य मोह से रहित हो जाते हैं, उनके अंदर से विकार समाप्त हो जाते हैं, कामादिक पाँचों से उनका साथ टूट जाता है।

हे नानक! कह– जिन मनुष्यों के हृदय में मेरा हरी-प्रभू आ बसा है मैं उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ।3।

अर्थ: हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारे लगते हैं, वही (असल) सेवक कहलवाते हैं। (हे भाई!) सच जान, मालिक प्रभू संतों से अलग नहीं है।1।

छंतु। (हे भाई! जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है (वैसे ही सेवक की) आत्मा परमात्मा के साथ मिली रहती है। पूर्ण सर्व-व्यापक करतार ने जिस सेवक को अपने में लीन कर लिया, उसके अंदर ये समझ पैदा हो जाती है कि (हर जगह) परमात्मा खुद ही खुद है, उसका हृदय (विकारों से) शून्य हो जाता है, आत्मिक अडोलता में उसकी समाधि लगी रहती है, उसके हृदय में एक परमात्मा की ही सिफत सालाह होती रहती है। (उसको निश्चय बना रहता है कि) परमात्मा सारे संसार में खुद ही छुपा हुआ है, फिर भी वह खुद माया के मोह से रहित है (हर जगह व्यापक होने के कारण) वह खुद ही अपने आप को सिमर रहा है। हे नानक! उस मनुष्य के अंदर से भ्रम-डर और माया के तीन गुण नाश हो जाते हैं, (वह ऐसे परमात्मा के साथ एक-रूप हुआ रहता है, जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है।4।2।

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