सलोक मः ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जमहि आवहि जाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअनि मुहि कालै उठि जाहि ॥१॥ महला १ ॥ जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥ नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥२॥ पउड़ी ॥ हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥ हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥ जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥ जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥ नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥१०॥ {पन्ना 589}
अर्थ: मनुष्य सतिगुरू की सेवा से वंचित हो के अहंकार के आसरे कर्म करते हैं, पर वह कर्म उनकी आत्मा के लिए बँधन हो जाते हैं, सतिगुरू के बताए हुए कर्म ना करने के कारण उन्हें कहीं भी जगह नहीं मिलती, वे मरते हैं (फिर) पैदा होते हैं, (संसार में) आते हैं, (फिर) चले जाते हैं; सतिगुरू द्वारा निर्देशित सेवा से वंचित रह कर उनके बोल भी फीके होते हैं और ‘नाम’ उनके मन में बसता नहीं। हे नानक! सतिगुरू की सेवा के बिना काले मुँह (संसार से) चले जाते हैं और जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं (भाव, इस लोक में काला मुँह करवाते हैं और आगे भी दुखी होते हैं)।1।
मैं ऐसी रीति को जला डालूँ जिसके कारण प्यारा प्रभू मुझे बिसर जाए, हे नानक! प्रेम वह ही अच्छा है जिससे पति से इज्जत बनी रहे।2।
एक ही दातार करतार की सेवा करनी चाहिए, एक परमात्मा को ही सिमरना चाहिए, एक हरी से ही दान माँगना चाहिए, जिस के पास से मन-मांगी मुराद मिल जाए; अगर किसी और से मांगें तो ये शर्म से मर जाएं (भाव, किसी और से माँगने से बेहतर है शर्म से मर जाएं)। जिस भी मनुष्य ने हरी की सेवा की है उसने फल पा लिया है, उस मनुष्य की सारी तृष्णा मिट गई है।
नानक कुर्बान जाता है उन मनुष्यों से, जो हर वक्त हृदय में हरी का नाम सिमरते हैं।10।



