गूजरी महला ५ तिपदे घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख बिनसे सुख कीआ निवासा त्रिसना जलनि बुझाई ॥ नामु निधानु सतिगुरू द्रिड़ाइआ बिनसि न आवै जाई ॥१॥ हरि जपि माइआ बंधन तूटे ॥ भए क्रिपाल दइआल प्रभ मेरे साधसंगति मिलि छूटे ॥१॥ रहाउ ॥ आठ पहर हरि के गुन गावै भगति प्रेम रसि माता ॥ हरख सोग दुहु माहि निराला करणैहारु पछाता ॥२॥ जिस का सा तिन ही रखि लीआ सगल जुगति बणि आई ॥ कहु नानक प्रभ पुरख दइआला कीमति कहणु न जाई ॥३॥१॥९॥ {पन्ना 497-498}
अर्थ: हे भाई! मेरे प्रभू जी जिस मनुष्य पर कृपाल होते हैं, वह मनुष्य साध-संगति में मिल के माया के बंधनों से आजाद हो जाता है, परमात्मा का नाम जप के उसके माया के बंधन टूट जाते हैं।1। रहाउ।
हे भाई! गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में (सारे सुखों का) खजाना हरी-नाम पक्का कर दिया है, वह आत्मिक मौत नहीं सहता। वह ना (बार-बार) पैदा होता है ना मरता है। उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं, उसके अंदर सुख आ निवास करते हैं, परमात्मा का नाम उसकी तृष्णा की जलन बुझा देता है।1।
(हे भाई! जिस मनुष्य पर प्रभू जी दयावान होते हैं, वह) परमात्मा की भक्ति और प्यार के स्वाद में मस्त हो के आठों पहर परमात्मा के गुण गाता रहता है। (इस तरह) वह खुशी और ग़मी दोनों से निर्लिप रहता है, वह सदा सृजनहार-प्रभू के साथ सांझ डाले रखता है।1।
(हे भाई! प्रभू की दया से) जो मनुष्य उस प्रभू का ही सेवक बन जाता है, वह प्रभू ही उसको माया के बंधनों से बचा लेता है, उस मनुष्य की सारी जीवन-मर्यादा सदाचारी बन जाती है।
हे नानक! कह– सर्व-व्यापक प्रभू जी (अपने सेवकों पर सदैव) दयावान रहते हैं। प्रभू की दयालता का मूल्य नहीं बताया जा सकता।3।1।9।
नोट: शीर्षक में लिखा है ‘तिपदे’ (तीन बंदों वाले शबद–बहुवचन)। पर, यहाँ सिर्फ यही एक ‘तिपदा’ दर्ज है।



