Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 16-5-26

रागु सूही छंत महला ३ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥ गुरमुखि हरि फलु पावहु ॥ गुरमुखि फलु पावहु हरि नामु धिआवहु जनम जनम के दूख निवारे ॥ बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि कारज सभि सवारे ॥ हरि प्रभु क्रिपा करे हरि जापहु सुख फल हरि जन पावहु ॥ नानकु कहै सुणहु जन भाई सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥१॥ सुणि हरि गुण भीने सहजि सुभाए ॥ गुरमति सहजे नामु धिआए ॥ जिन कउ धुरि लिखिआ तिन गुरु मिलिआ तिन जनम मरण भउ भागा ॥ अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥ जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥ सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥२॥ जुग महि राम नामु निसतारा ॥ गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥ गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥ सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥ सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥ जुग महि राम नामु निसतारा ॥३॥ साजन आइ वुठे घर माही ॥ हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥ हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥ दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥ नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥ साजन आइ वुठे घर माही ॥४॥१॥

अर्थ: हे भाई जनो! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाया करो। गुरू की शरण पड़ कर (सिफत सालाह के गीत गाने से) परमात्मा के दर से (इसका) फल प्राप्त करोगे।

हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा करो, (इसका) फल हासिल करोगे, परमात्मा का नाम अनेकों जन्मों के दुख दूर कर देता है। जिस गुरू ने तुम्हारे (लोक-परलोक के) सारे काम सवार दिए हैं, उस अपने गुरू से सदके जाओ।

हे भाई! परमात्मा का नाम जपा करो। हरी प्रभू कृपा करेगा, (उसके दर से) आत्मिक आनंद का फल प्राप्त कर लोगे। नानक कहता है–हे भाई जनो! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो।1।

हे भाई! परमात्मा की सिफत सालाह सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है। हे भाई! तू भी गुरू की मति पर चल के प्रभू का नाम सिमर के आत्मिक अडोलता में टिक। हे भाई! जिन मनुष्यों के माथे पर धुर-दरगाह से लिखे लेख उघड़ते हैं उनको गुरू मिलता है (और नाम की बरकति से) उनका जनम-मरण (के चक्करों) का डर दूर हो जाता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है, वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ता है।

हे भाई! मेरे मालिक प्रभू ने जिन मनुष्यों पर मेहर की, उन्होंने हर वक्त परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। हे मन! (परमात्मा की सिफत सालाह) सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है।2।

हे भाई! जगत में परमात्मा का नाम ही (हरेक जीव का) पार उतारा करता है। जो मनुष्य गुरू से नया आत्मिक जीवन लेता है, वह गुरू के शबद को विचारता है। वह मनुष्य गुरू के शबद को (ज्यों-ज्यों) विचारता है (त्यों-त्यों) परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगने लग जाता है। पर, हे भाई! जिस मनुष्य पर प्रभू कृपा करता है, वही मनुष्य (ये दाति) प्राप्त करता है।

वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के दिन-रात परमात्मा के गुण गाता रहता है, और अपने सारे पाप दूर कर लेता है।

हे प्रभू! हरेक जीव तेरा (पैदा किया हुआ है), तू सारे जीवों का पति है। हे प्रभू! मैं तेरा (सेवक) हॅूँ, तू हमारा मालिक है (हमें अपना नाम बख्श)। हे भाई! संसार में परमात्मा का नाम (ही हरेक जीव का पार-उतारा करता है)।3।

हे भाई! जिन मनुष्यों के हृदय-घर में सज्जन-प्रभू जी आ बसते हैं, वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं, माया की ओर से संतोषी हो जाते हैं, वे तृप्त हो जाते हैं।

हे भाई! जो जीवात्मा सदा प्रभू के गुण गा-गा के (माया की ओर से) तृप्त हो जाती है, उसे दोबारा माया की भूख आ के नहीं चिपकती। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है, उस सेवक की हर जगह इज्जत होती है।

हे नानक! परमात्मा खुद ही (किसी को माया में) जोड़ के (अपने चरणों से) विछोड़ता है। परमात्मा के बिना और कोई (ऐसी समर्था वाला) नहीं है। (जिस के ऊपर मेहर करते हैं) उसके हृदय-गृह में सज्जन-प्रभू जी आ के निवास करते हैं।4।1।

 

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