Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 18-10-26

बिहागड़ा महला ५ छंत ॥
बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥ तू नेत्री देखि चलिआ माइआ बिउहारी राम ॥ संगि तेरै कछु न चालै बिना गोबिंद नामा ॥ देस वेस सुवरन रूपा सगल ऊणे कामा ॥ पुत्र कलत्र न संगि सोभा हसत घोरि विकारी ॥ बिनवंत नानक बिनु साधसंगम सभ मिथिआ संसारी ॥१॥ राजन किउ सोइआ तू नीद भरे जागत कत नाही राम ॥ माइआ झूठु रुदनु केते बिललाही राम ॥ बिललाहि केते महा मोहन बिनु नाम हरि के सुखु नही ॥ सहस सिआणप उपाव थाके जह भावत तह जाही ॥ आदि अंते मधि पूरन सरबत्र घटि घटि आही ॥ बिनवंत नानक जिन साधसंगमु से पति सेती घरि जाही ॥२॥ नरपति जाणि ग्रहिओ सेवक सिआणे राम ॥ सरपर वीछुड़णा मोहे पछुताणे राम ॥ हरिचंदउरी देखि भूला कहा असथिति पाईऐ ॥ बिनु नाम हरि के आन रचना अहिला जनमु गवाईऐ ॥ हउ हउ करत न त्रिसन बूझै नह कांम पूरन गिआने ॥ बिनवंति नानक बिनु नाम हरि के केतिआ पछुताने ॥३॥ धारि अनुग्रहो अपना करि लीना राम ॥ भुजा गहि काढि लीओ साधू संगु दीना राम ॥ साधसंगमि हरि अराधे सगल कलमल दुख जले ॥ महा धरम सुदान किरिआ संगि तेरै से चले ॥ रसना अराधै एकु सुआमी हरि नामि मनु तनु भीना ॥ नानक जिस नो हरि मिलाए सो सरब गुण परबीना ॥४॥६॥९॥ {पन्ना 547}

अर्थ: हे (सारी) जूनियों में से (उक्तम फर्ज वाले, धर्म वाले!) परमात्मा के सिफत सालाह के बोल बोला कर। (सिफत सालाह से) तूने क्यूँ चुप धारण की हुई है? अपनी आँखों से (ध्यान से) देख; (निरी) माया का व्यवहार करने वाला (यहाँ से खाली हाथ) चला जाता है। हे भाई! परमात्मा के नाम के बिना और कोई चीज तेरे साथ नहीं जा सकती। देशों (की हकूमतें), कपड़े सोना, चाँदी (-इनकी खातिर किए हुए) सारे उद्यम व्यर्थ हो जाते हैं। हे भाई! पुत्र, स्त्री, दुनियावी मान-सम्मान- कुछ भी मनुष्य के साथ नहीं जाता। हाथी घोड़े आदि की लालसाएं भी विकारों की ओर ले जाती हैं। नानक विनती करता है– साध-संगत के बिना दुनिया के सारे उद्यम नाशवान हैं।

हे धरती के सरदार, मनुष्य! तू क्यूँ माया के मोह की गाढ़ी नींद में सो रहा है? तू क्यों सचेत नहीं होता? इस माया की खातिर अनेकों ही मनुष्य झूठा रोना-धोना करते आ रहे हैं, विलकते आ रहे हैं। बेअंत प्राणी इस खासी मन-मोहनी माया की खातिर तरले लेते आ रहे हैं (कि माया मिले और माया से सुख मिले, पर) परमात्मा के नाम के बिना सुख (किसी को) नहीं मिला। जीव हजारों चतुराईयाँ हजारों वसीले करते थक जाते हैं (माया के मोह में से खलासी भी नहीं होती। हो भी कैसे?) जिधर परमात्मा की मर्जी होती है उधर ही जीव जा सकते हैं। वह परमात्मा सदा के लिए ही सर्व-व्यापक है, हर जगह मौजूद है, हरेक शरीर में है। नानक विनती करता है– जिन मनुष्यों को गुरू का मिलाप प्राप्त होता है वह (यहाँ से) इज्जत से परमात्मा की हजूरी में जाते हैं।2।

अर्थ: (अगर कोई मनुष्य) राजा (बन जाता है, तो वह) अपने सेवकों को (अपने) जान के (राज के मोह में) फस जाता है। (पर दुनिया के सारे पदार्थों से) जरूर विछुड़ जाना है, (जो मनुष्य दुनियावी मोह में) फंसते हैं, वह आखिर हाथ मलते रह जाते हैं। मनुष्य आकाश के काल्पनिक शहर हरीचंदौरी जैसे जगत को देख के गलत राह पर पड़ जाता है, पर यहाँ कहीं भी सदा का ठिकाना नहीं मिल सकता। परमात्मा के नाम से टूट के, जगत-रचना के और ही पदार्थों में फंस के श्रेष्ठ मानस जन्म को गवा लेता है।3।

“मैं (बड़ा बन जाऊँ), मैं (बड़ा बन जाऊँ)” – ये करते करते माया की तृष्णा खत्म नहीं होती, मानस जन्म का उद्देश्य हासिल नहीं हो सकता, आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। नानक विनती करता है– परमात्मा के नाम से टूट के अनेकों जीव हाथ मलते जाते हैं।3।

अर्थ: (हे भाई! जिस मनुष्य को) परमात्मा दया करके अपना बना लेता है उसको गुरू का मिलाप बख्शता है, उसे बाँह से पकड़ के (मोह के कूँए में से) निकाल लेता है। जो मनुष्य गुरू की संगत में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है उसके सारे पाप सारे दुख जल जाते हैं।

हे भाई! सबसे बड़ा धर्म नाम जपने का धर्म, और सबसे बड़ा दान- नाम दान – यही काम (जगत से) तेरे साथ जा सकते हैं। हे नानक! (कह–) जो मनुष्य अपनी जीभ से एक मालिक प्रभू की आराधना करता रहता है उसका मन उसका हृदय परमात्मा के नाम-जल में तरो-तर हुआ रहता है। जिस मनुष्य को परमात्मा अपने चरणों में जोड़ लेता है वह सारे गुणों में प्रवीण हो जाता है।4।6।9।

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