बिलावलु महला ५ ॥
सहज समाधि अनंद सूख पूरे गुरि दीन ॥ सदा सहाई संगि प्रभ अम्रित गुण चीन ॥ रहाउ॥ जै जै कारु जगत्र महि लोचहि सभि जीआ ॥ सुप्रसंन भए सतिगुर प्रभू कछु बिघनु न थीआ ॥१॥ जा का अंगु दइआल प्रभ ता के सभ दास ॥ सदा सदा वडिआईआ नानक गुर पासि ॥२॥१२॥३०॥
नोट: ‘चीन्’ में अक्षर ‘न’ के नीचे अर्ध ‘ह’ है।
अर्थ: (हे भाई! जिस मनुष्य पर गुरु दयावान होता है, उसको) पूरे गुरु ने आत्मिक अडोलता में एक-रस टिकाव के सारे सुख व आनंद दे दिए। प्रभु उस मनुष्य का हमेशा मददगार बना रहता है, उसके अंग-संग रहता है, वह मनुष्य प्रभु के आत्मिक जीवन देने वाले गुण (अपने मन में) विचारता रहता है। रहाउ।
हे भाई! जिस मनुष्य पर गुरु परमात्मा अच्छी तरह प्रसन्न हो गए, उस मनुष्य के जीवन-राह में कोई रुकावट नहीं आती, सारे जगत में हर जगह उसकी शोभा होती है, (ज्रगत के) सारे जीव (उसके दर्शन करना) चाहते हैं1।
हे भाई! दया का श्रोत प्रभु, जिस (मनुष्य) का पक्ष करता है, सब जीव उसके सेवक हो जाते हैं। हे नानक! गुरु के चरणों में रहने से सदा ही आदर-मान मिलता है।2।12।30।



