सलोकु मः ५ ॥
हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥ जिनि कीती तिसै न जाणई नानक फिटु अलूणी देह ॥१॥ मः ५ ॥ घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥ नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥२॥ पउड़ी ॥ आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥ आपे संजमि वरतै स्वामी आपि जपाइहि नामु ॥ आपि दइआलु होइ भउ खंडनु आपि करै सभु दानु ॥ जिस नो गुरमुखि आपि बुझाए सो सद ही दरगहि पाए मानु ॥ जिस दी पैज रखै हरि सुआमी सो सचा हरि जानु ॥१४॥
अर्थ: जो मनुष्य साधु-संगत में हरि का नाम नहीं स्मरण करते, उनके शरीर पर राख पड़ती है (भाव, उनके शरीर धिक्कारे जाते हैं)। हे नानक! प्रेम से विहीन उस शरीर को धिक्कार है, जो उस प्रभु को नहीं पहचानता जिसने उसको बनाया है।1।
अर्थ: हे नानक! (जिस मनुष्य के) हृदय में प्रभु के चरण-कमल बसते हैं और जिहवा हरि को जपती है, और प्रभु (जिस शरीर के होने से) स्मरण किया जाता है उस शरीर की पालना करो।2।
प्रभु स्वयं ही अढ़सठ तीर्थों को करने वाला है, खुद ही (उन तीर्थों पर) स्नान करता है, मालिक स्वयं ही जुगति में बरतता है और खुद ही नाम जपाता है, भय दूर करने वाला प्रभु खुद ही दयालु होता है और खुद ही सब तरह के दान करता है, जिस मनुष्य को सतिगुरु के माध्यम से समझ बख्शता है, वह सदा ही दरगाह में आदर पाता है। जिसकी इज्जत खुद रखता है वह ईश्वर का प्यारा सेवक ईश्वर का ही रूप है।14।



