बिलावलु महला ५ ॥
इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥ साधसंगति कै संगि वसै वडभागी पाए ॥१॥ सुणि सुणि जीवै दासु तुम्ह बाणी जन आखी ॥ प्रगट भई सभ लोअ महि सेवक की राखी ॥१॥ रहाउ ॥ अगनि सागर ते काढिआ प्रभि जलनि बुझाई ॥ अम्रित नामु जलु संचिआ गुर भए सहाई ॥२॥ जनम मरण दुख काटिआ सुख का थानु पाइआ ॥ काटी सिलक भ्रम मोह की अपने प्रभ भाइआ ॥३॥ मत कोई जाणहु अवरु कछु सभ प्रभ कै हाथि ॥ सरब सूख नानक पाए संगि संतन साथि ॥४॥२२॥५२॥ {पन्ना 813-814}
अर्थ: हे प्रभू! तेरे सेवक तेरी सिफत-सालाह की जो बाणी उचारते हैं, तेरा दास उस बाणी को हर वक्त सुन-सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। (इस तरह विकारों से बचा के) तू अपने सेवक की जो इज्जत रखता है वह सारे संसार में प्रकट हो जाती है।1। रहाउ।
(हे भाई! ये जगत, मानो, एक समुंद्र है जिसमें विकारों का पानी भरा पड़ा है) इस समुंद्र में से वही मनुष्य पार लांघता है, जो परमात्मा के सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है, जो साध-संगति के साथ मेल-जोल रखता है। (पर यह दाति) कोई भाग्यशाली मनुष्य ही प्राप्त करता है।1।
(हे भाई! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लिया) परमात्मा ने खुद उसको (विकारों की) आग के समुंद्र में से निकाल लिया, परमात्मा ने स्वयं (उसके अंदर से विकारों की जलन) शांत कर दी। सतिगुरू जी ने उस सेवक की सहायता की, और (उसके हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल छिड़का।2।
(हे भाई! जिस सेवक ने सिफत-सालाह की बाणी सुन-सुन के आत्मिक जीवन पा लिया) उसने जनम-मरण के चक्कर का दुख काट लिया, उसने वह (आत्मिक) ठिकाना पा लिया जहाँ सुख ही सुख है, उसने (अपने अंदर से) भटकना और मोह की फाही काट ली, वह सेवक अपने प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ा।3।
(पर, हे भाई!) कहीं यह ना समझ लेना (कि ऐसा आत्मिक) आनंद लेने के लिए हमारा (जीवों का) और कोई चारा चल सकता है (यकीन से जानो कि) हरेक जुगति परमात्मा के (अपने) हाथ में है। हे नानक! वही सेवक सारे सुख प्राप्त करता है जो संत-जनों की संगति में रहता है जो संतजनों के साथ रहता है।4।22।52।



