Rojana Hukamnama (HINDI) Gurudwara Moti Bagh Sahib Delhi – 25-11-25

रागु सोरठि बाणी भगत रविदास जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥ अनल अगम जैसे लहरि मइ ओदधि जल केवल जल मांही ॥१॥ माधवे किआ कहीऐ भ्रमु ऐसा ॥ जैसा मानीऐ होइ न तैसा ॥१॥ रहाउ ॥ नरपति एकु सिंघासनि सोइआ सुपने भइआ भिखारी ॥ अछत राज बिछुरत दुखु पाइआ सो गति भई हमारी ॥२॥ राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ॥ अनिक कटक जैसे भूलि परे अब कहते कहनु न आइआ ॥३॥ सरबे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भुोगवै सोई ॥ कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होई ॥४॥१॥ {पन्ना 657-658}

अर्थ: (हे माधो!) जब तक हम जीवों में अहंकार रहता है, तब तक तू (हमारे अंदर) प्रकट नहीं होता, पर जब तू प्रत्यक्ष होता है तब हमारी ‘मैं’ दूर हो जाती है; (इस ‘मैं’ के हटने से ही हमें ये समझ आ जाती है कि) जैसे बड़ा तूफ़ान आने से समुंद्र लहरों से नाको-नाक भर जाता है, पर असल में वह (लहरें समुंद्र के) पानी में पानी ही हैं (वैसे ही ये सारे जीव-जंतु तेरा अपना ही विकास हैं)।1।

हे माधो! हम जीवों को कुछ ऐसा भुलेखा पड़ा हुआ है कि ये बयान नहीं किया जा सकता। हम जो मानें बैठे हैं (कि जगत तेरे से कोई अलग हस्ती है), वह ठीक नहीं है।1। रहाउ।

(जैसे) कोई राजा अपने तख़्त पर बैठा सो जाए, और सपने में भिखारी बन जाए, राज होते हुए भी वह (सपने में राज से) विछुड़ के दुखी होता है, वैसे ही (हे माधो! तुझसे विछुड़ के) हम जीवों का हाल हो रहा है।2।

जैसे रस्सी और साँप का दृष्टांत है, जैसे (सोने से बने हुए) अनेकों कड़े देख के भुलेखा पड़ जाए (कि सोना ही कई किस्म का होता है, वैसे ही हमें भुलेखा पड़ा हुआ है कि ये जगत तुझसे अलग है), पर तूने अब मुझे कुछ-कुछ भेद जता दिया है। अब वह पुरानी भेद-भाव वाली बात मुझसे कहीं नहीं जाती (भाव, अब मैं ये नहीं कहता कि जगत तुझसे अलग हस्ती है)।3।

(अब तो) रविदास कहता है कि वह प्रभू-पति अनेकों रूप बना के सभी में एक स्वयं ही है, सभी घटों में खुद ही बैठा जगत के रंग माण रहा है। (दूर नहीं) मेरे हाथ से भी नजदीक है, जो कुछ (जगत में) हो रहा है, उसी की रजा में हो रहा है।4।1।

शबद का भाव: परमात्मा सर्व-व्यापक है। पर जीव अपनी ‘हउ’ (मैं) के घेरे में रह के जगत को उससे अलग हस्ती समझता है। जब तक ‘मैं’ है, तब तक भेदभाव है।

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