वडहंसु महला १ ॥
बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥ सचा घरु सचड़ै सेवीऐ सचु खरा सचिआरोवा ॥ कूड़ि लबि जां थाइ न पासी अगै लहै न ठाओ ॥ अंतरि आउ न बैसहु कहीऐ जिउ सुंञै घरि काओ ॥ जमणु मरणु वडा वेछोड़ा बिनसै जगु सबाए ॥ लबि धंधै माइआ जगतु भुलाइआ कालु खड़ा रूआए ॥१॥ बाबा आवहु भाईहो गलि मिलह मिलि मिलि देह आसीसा हे ॥ बाबा सचड़ा मेलु न चुकई प्रीतम कीआ देह असीसा हे ॥ आसीसा देवहो भगति करेवहो मिलिआ का किआ मेलो ॥ इकि भूले नावहु थेहहु थावहु गुर सबदी सचु खेलो ॥ जम मारगि नही जाणा सबदि समाणा जुगि जुगि साचै वेसे ॥ साजन सैण मिलहु संजोगी गुर मिलि खोले फासे ॥२॥ बाबा नांगड़ा आइआ जग महि दुखु सुखु लेखु लिखाइआ ॥ लिखिअड़ा साहा ना टलै जेहड़ा पुरबि कमाइआ ॥ बहि साचै लिखिआ अम्रितु बिखिआ जितु लाइआ तितु लागा ॥ कामणिआरी कामण पाए बहु रंगी गलि तागा ॥ होछी मति भइआ मनु होछा गुड़ु सा मखी खाइआ ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि नांगो बंधि चलाइआ ॥३॥ बाबा रोवहु जे किसै रोवणा जानीअड़ा बंधि पठाइआ है ॥ लिखिअड़ा लेखु न मेटीऐ दरि हाकारड़ा आइआ है ॥ हाकारा आइआ जा तिसु भाइआ रुंने रोवणहारे ॥ पुत भाई भातीजे रोवहि प्रीतम अति पिआरे ॥ भै रोवै गुण सारि समाले को मरै न मुइआ नाले ॥ नानक जुगि जुगि जाण सिजाणा रोवहि सचु समाले ॥४॥५॥ {पन्ना 581-582}
(नोट: हिन्दुओं में लड़की–लड़के के ब्याह का समय पण्डित शास्त्रों को विचार के मुकरॅर करता है। ये नियम ‘साहा’ आगे पीछे नहीं किया जा सकता। जैसे विवाह करके लड़की को माँ–बाप के घर से निहित ‘साहे’ के मुताबिक ससुराल भेज दिया जाता है, वैसे ही जीव–स्त्री जगत रूपी माता–पिता के के घर से चल पड़ती है)।
अर्थ: हे भाई! (जगत में जो भी जीव जनम ले के) आया है उसने (आखिर यहाँ से) कूच कर जाना है (किसी ने यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) ये जगत है ही नाशवंत पसारा। यदि सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का सिमरन करें तो सदा-स्थिर रहने वाला ठिकाना मिल जाता है। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को सिमरता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है, वह सदा-स्थिर प्रभू के प्रकाश के योग्य बन जाता है।
जो मनुष्य माया के मोह में अथवा माया के लालच में फसा रहता है वह परमात्मा की दरगाह में कबूल नहीं होता, उसको प्रभू की हजूरी में जगह नहीं मिलती। जैसे सूने घर में गए कौए को (किसी ने रोटी की गिराही आदि नहीं डालनी) (वैसे ही माया के मोह में फंसे जीव को प्रभू की हजूरी में) किसी ने ये नहीं कहना – आओ जी, अंदर आ जाओ बैठ जाओ। उस मनुष्य को जनम-मरन के चक्र भुगतने पड़ जाते हैं, उसको (इस चक्कर के कारण प्रभू-चरनों से) लंबा विछोड़ा हो जाता है। (माया के मोह में फस के) जगत आत्मिक मौत सहेड़ रहा है (जो भी मोह में फंसते हैं वे) सारे (आत्मिक मौत मरते हैं)। लालच के कारण माया के ही आहर में पड़ा हुआ जगत सही जीवन राह से टूटा रहता है। इस सिर पर खड़ा काल इसे दुखी करता रहता है।1।
हे भाई! हे भाईयो! आओ, हम प्यार से मिल के बैठें, और मिल के (अपने विछुड़े साथी को) आसीसें दें (उसके वास्ते प्रभू दर पर अरदासें करें) प्रीतम-प्रभू से मिलने की आशीशें दें (प्रार्थनाएं करें। सदा-स्थिर मेल सिर्फ परमात्मा से ही होता है और अरदास की बरकति से वह) सदा स्थिर रहने वाला मिलाप कभी खत्म नहीं होता।
(हे सत्संगी भाईयो! मिल के विछुड़े साथी के लिए) अरदासें करो (और खुद भी) परमात्मा की भक्ति करो (भक्ति की बरकति से परमात्मा के चरणों में मिलाप हो जाता है) जो एक बार प्रभू चरणों से मिल जाते हैं उनका फिर कभी विछोड़ा नहीं होता।
पर, कई ऐसे हैं जो परमात्मा के नाम से टूटे फिरते हैं जो सदा-कायम रहने वाले ठिकाने से उखड़े फिरते हैं। सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरना सही जीवन-खेल है जो गुरू के शबद में जुड़ के खेली जा सकती है। जो मनुष्य गुरू के शबद में लीन रहते हैं वे जम के रास्ते पर नहीं जाते, वे सदा के लिए ही उस परमात्मा में जुड़े रहते हैं जिसका स्वरूप (भेष) सदा के लिए अटल है।
हे सज्जन मित्र सत्संगियो! सत्संग में मिल बैठो। जो लोग सत्संग में आए हैं उन्होंने गुरू को मिल के माया के मोह के बँधन काट लिए हैं।2।
हे भाई! (जीव अपने पूर्बले किए कर्मों के अनुसार नए जीवन में भोगने के लिए) दुख और सुख रूपी लेख (परमातमा की दरगाह में से अपने माथे पर) लिखा के जगत में नंगा ही आता है (जनम के समय ही वह समय भी नियत किया जाता है जब जीव ने जगत से वापस चले जाना होता है) वह मुकरॅर किया हुआ समय आगे पीछे नहीं हो सकता (ना ही वह दुख-सुख घटित होने से हट सकता है) जो पूर्बले जनम में कर्म करके (कमाई के रूप में) कमाया है। (जीव के किए कर्मों के अनुसार) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा ने सोच-विचार के लिख दिया होता है कि जीव के नए जीव-सफर में नाम-अमृत का व्यापार करना है अथवा माया-जहर की कमाई करनी है। (पिछले किए कर्मों के अनुसार ही प्रभू की रजा में) जिधर जीव को लगाया जाता है उधर ये लग पड़ता है। (उसी लेख अनुसार ही) जादू-टूणे वाली माया, जीव पर जादू कर देती है, इसके गले में कई रंगों वाला धागा डाल देती है (भाव, विभिन्न तरीकों से माया इसे मोह लेती है)। (इस मोहनी माया के प्रभाव में ही) जीव की मति तुच्छ हो जाती है, जीव का मन छोटा रह जाता है (भाव, इसमें भेद भाव और तेर मेर आ जाती है, अपने छोटे से स्वार्थ से बाहर सोच नहीं सकता देख नहीं सकता), जैसे मक्खी गुड़ खाती है (और गुड़ से चिपक के ही मर जाती है, वैसे ही जीव माया से चिपक के आत्मिक मौत मर जाता है)। जीव जगत में नंगा ही आता है और नंगा ही बाँध के आगे लगा लिया जाता है।3।
हे भाई! (जिस जीव को यहाँ से चले जाने का बुलावा आ जाता है, रो रो के उस बुलावे को टाला नहीं जा सकता, ये अटॅल नियम है, पर फिर भी) अगर किसी ने (इस बुलावे को टालने के लिए) रोना ही है तो रो-रो के देख ले। प्यारा संबन्धी बाँध के आगे चला दिया जाता है। (उसके यहाँ से कूच करने के लिए परमात्मा की दरगाह का) लिखा हुकम मिटाया नहीं जा सकता, प्रभू के दर से बुलावा आ जाता है (वह बुलावा अमिट है)।
जब परमात्मा को (अपनी रजा में) अच्छा लगता है, तो (जीव के लिए जाने का) बुलावा आ जाता है, रोने वाले संबन्धी रोते हैं। पुत्र, भाई, भतीजे, बड़े प्यारे सम्बन्धी (सभी ही) रोते हैं।
जीव (कूच कर जाने वाले अपने सम्बन्धी के पीछे दुनिया में घटित होने वाले दुखों के) सहम में रोता है, और उसके गुणों (सुखों) को बार-बार याद करता है, पर कभी भी कोई जीव मरे हुए प्राणियों के साथ मरता नहीं है (जीना हरेक को प्यारा लगता है, आई के बिना कोई मर भी नहीं सकता)।
हे नानक! (ये मरने और पैदा होने का सिलसिला तो जारी ही रहना है) वे लोग सदा ही बहुत समझदार हैं जो सदा-स्थिर-प्रभू के गुण हृदय में बसा के माया के मोह से उपराम रहते हैं।4।5।



