बिलावलु महला ५ ॥
सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥ अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥ मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥ करि किरपा हरि चरन धिआई ॥१॥ दइआ करहु बसहु मनि आइ ॥ मोहि निरगुन लीजै लड़ि लाइ ॥ रहाउ ॥ प्रभु चिति आवै ता कैसी भीड़ ॥ हरि सेवक नाही जम पीड़ ॥ सरब दूख हरि सिमरत नसे ॥ जा कै संगि सदा प्रभु बसै ॥२॥ प्रभ का नामु मनि तनि आधारु ॥ बिसरत नामु होवत तनु छारु ॥ प्रभ चिति आए पूरन सभ काज ॥ हरि बिसरत सभ का मुहताज ॥३॥ चरन कमल संगि लागी प्रीति ॥ बिसरि गई सभ दुरमति रीति ॥ मन तन अंतरि हरि हरि मंत ॥ नानक भगतन कै घरि सदा अनंद ॥४॥३॥ {पन्ना 802}
अर्थ: हे प्रभू! (मुझ पर) मेहर कर, मेरे मन में आ बस। मुझ गुण-हीन को अपने लड़ लगा लो। रहाउ।
हे सुखों के खजाने प्रभू! हे मेरे प्रीतम प्रभू! हे ठाकुर प्रभू! तेरे गुण गिने नहीं जा सकते। मैं अनाथ तेरी शरण आया हूँ। हे हरी! मेरे पर मेहर कर, मैं तेरे चरणों का ध्यान धरता रहूँ।1।
हे भाई! जब प्रभू मन में आ बसे, तो कोई भी विपदा छू नहीं सकती। प्रभू की सेवा भक्ति करने वाले मनुष्य को जमों का दुख भी डरा नहीं सकता। जिस मनुष्य के अंग-संग सदा परमात्मा बसता है, नाम सिमरने से उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं।2।
हे भाई! परमात्मा का नाम (ही मनुष्य के) मन को शरीर को आसरा (देने वाला) है, परमात्मा का नाम भूलने से शरीर (जैसे) राख (की ढेरी) हो जाता है जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम आ बसता है, उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। परमात्मा का नाम बिसर जाने से मनुष्य जगह-जगह का मुहताज हो जाता है।3।
हे भाई! परमात्मा के सुंदर चरणों से जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है, उसे खोटी मति वाला सारा (जीवन-) तौर-तरीका (रवईया) भूल जाता है। हे नानक! प्रभू के भक्तों के हृदय में सदा आनंद बना रहता है, क्योंकि उनके मन में उनके शरीर में परमात्मा का नाम-मंत्र बसता रहता है (जो दुर्मति को नजदीक नहीं फटकने देता)।4।3।



