सलोकु मः २ ॥
जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥ चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥१॥ मः २ ॥ राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥ नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥२॥ मः २ ॥ बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥ सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥३॥ मः २ ॥ मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥ तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥४॥ पउड़ी ॥ करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥ जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥ सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥७॥ {पन्ना 787-788}
अर्थ: वह मनुष्य दुनिया के बड़े पसारे नहीं पसारते (भाव, मन को जगत के धंधों में खिलार देते) जिन्होंने ये समझ लिया है कि यहाँ से चले जाना है; पर निरे दुनिया के काम सुलझाने वाले बंदे (यहाँ से आखिर) चले जाने का ख्याल भी नहीं करते।1।
हे नानक! अगर सिर्फ रात के कारण धन इकट्ठा करें तो सवेरे (यहाँ से उठ के) चल पड़ना है (चलने के वक्त वह धन) साथ ना जा सके तो हाथ मलने पड़ने हैं।2।
जो मनुष्य कोई काम बेमना हो के (खुशी से ना) करे, तो उसका लाभ ना उसे खुद को ना किसी और को। हे नानक! वही काम सफल हुआ समझो जो खुशी से (मन लगाकर) किया जाए।3।
चाहे कितनी ही मेहनत मनुष्य करे, ईश्वर वाला पासा मन के हठ से नही जीता जा सकता, हे दास नानक! वह मनुष्य (यह) पासा जीतता है जो शुभ भावना बरतता है और गुरू के शबद को विचारता है।4।
जिस करतार ने यह जगत बनाया है इसकी संभाल करनी वह खुद ही जानता है; उसने खुद ही सृष्टि पैदा की है, और खुद ही फिर नाश करता है। जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभू की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)।
जिस मनुष्य को गुरू ने वह एक प्रभू दिखा दिया है उस के मन में उसके तन में सुख होता है; जो करतार सब कुछ करने में खुद समर्थ है उसकी गुरू के माध्यम से ही सिफत सालाह की जा सकती है।7।



